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साहेब कबीर द्वारा श्री नानक जी को सत्यज्ञान समझाना

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श्री नानकदेव जी को जो पहले एक औंकार (ओ3म) मन्त्रा का जाप करते थे तथा उसी को सत मान कर कहा करते थे एक ओंकार। उन्हें बेई नदी पर कबीर साहेब ने दर्शन दे कर सतलोक (सच्चखण्ड) दिखाया तथा अपने सतपुरुष रूप को दिखाया। जब सतनाम का जाप दिया तब श्री नानक साहेब जी की काल लोक से मुक्ति हुई। श्री नानक साहेब जी ने कहा कि:

इसी का प्रमाण पंजाबी गुरु ग्रन्थ साहिब के राग ‘‘सिरी‘‘ महला 1 पृष्ठ नं. 24 पर शब्द नं. 29

शब्द - एक सुआन दुई सुआनी नाल, भलके भौंकही सदा बिआल।
कुड़ छुरा मुठा मुरदार, धाणक रूप रहा करतार।।1।।
मै पति की पंदि न करनी की कार। उह बिगड़ै रूप रहा बिकराल।।
तेरा एक नाम तारे संसार, मैं ऐहा आस एहो आधार।
मुख निंदा आखा दिन रात, पर घर जोही नीच मनाति।।
काम क्रोध तन वसह चंडाल, धाणक रूप रहा करतार।।2।।
फाही सुरत मलूकी वेस, उह ठगवाड़ा ठगी देस।।
खरा सिआणां बहुता भार, धाणक रूप रहा करतार।।3।।
मैं कीता न जाता हरामखोर, उह किआ मुह देसा दुष्ट चोर।
नानक नीच कह बिचार, धाणक रूप रहा करतार।।4।।

इसमें स्पष्ट लिखा है कि एक (मन रूपी) कुत्ता तथा इसके साथ दो (आसा-तृष्णा रूपी) कुतिया अनावश्यक भौंकती (उमंग उठती) रहती हैं तथा सदा नई-नई आसाएँ उत्पन्न (ब्याती हैं) होती हैं। इनको मारने का तरीका (जो सत्यनाम बिना) झूठा (कुड़) साधन (मुठ मुरदार) था। मुझे (कबीर साहेब) धाणक के रूप में परमात्मा मिला। उन्होंने मुझे सही उपासना बताई।

श्री नानक साहेब जी कहते हैं कि उस ईश्वर (धाणक कबीर साहेब) की साधना बिना न तो पति (साख) रहनी थी न ही कोई अच्छी करनी (कमाई) बन रही थी। जिससे काल का भयंकर रूप जो अब महसूस हुआ है उससे केवल कबीर साहेब तेरा एक (सत्यनाम) नाम पूर्ण संसार को पार (काल लोक से निकाल सकता है) कर सकता है। मुझे (नानक जी कहते हैं) भी एही एक तेरे नाम की आश व यही नाम मेरा आधार है। पहले अनजाने में बहुत निंदा भी की होगी क्योंकि काम क्रोध इस तन में चंडाल रहते हैं।

मुझे धाणक (जुलाहे का कार्य करने वाले कबीर साहेब) रूपी भगवान ने आकर सतमार्ग बताया तथा काल से छुटवाया। जिसकी सुरति (स्वरूप) बहुत प्यारी व मनमोहनी है तथा सुन्दर वेष भूशा (जिन्दा रूप में) मुझे मिले उसको कोई नहीं पहचान सकता। जिसने काल को भी ठग लिया अर्थात् लगता है धाणक (जुलाहा) फिर बन गया जिन्दा। काल भगवान भी भ्रम में पड़ गया कि यह कोई नीच जाति का है, भगवान (पूर्णब्रह्म) नहीं हो सकता। इसी प्रकार कबीर साहेब अपना वास्तविक अस्तित्व छुपा कर एक सेवक बन कर आते हैं। काल या आम व्यक्ति पहचान नहीं सकता। इसलिए श्री नानक साहेब जी ने उसे प्यार में ठगवाड़ा कहा है और साथ में कहा है कि वह धाणक (जुलाहा कबीर) बहुत समझदार है। दिखाई देता है कुछ परंतु है बहुत महिमा (बहुता भार) वाला जो धाणक जुलाहा रूप मंे स्वयं परमात्मा पूर्ण ब्रह्म आया है। प्रत्येक जीव को आधीनी समझाने के लिए अपनी भूल को स्वीकार करते हुए कि मैंने (नानक जी ने) पूर्णब्रह्म के साथ बहस (वाद-विवाद) की तथा उन्होंने (कबीर साहेब ने) अपने आपको भी (एक लीला करके) सेवक रूप में दर्शन दे कर तथा (नानक जी को) मुझको स्वामी नाम से सम्बोधित किया। इसलिए उनकी महानता तथा अपनी नादानी का पश्चाताप करते हुए श्री नानक जी कहते हैं कि मैं (नानक जी) कुछ करने कराने योग्य नहीं था। फिर भी अपनी साधना को उत्तम मान कर भगवान से सम्मुख हुआ (ज्ञान संवाद किया)। मेरे जैसा नीच दुष्ट, हरामखोर कौन हो सकता है जो अपने स्वामी-मालिक पूर्ण परमात्मा धाणक रूप (जुलाहा रूप में आए करतार कबीर साहेब) को नहीं पहचान पाया। श्री नानक साहेब जी कहते हैं कि यह सब मैं पूर्ण सोच समझ से कह रहा हूँ कि परमात्मा धाणक (जुलाहा कबीर) रूप में हैं और अधिक प्रमाण के लिए प्रस्तुत है:--

‘‘राग तिलंग महला 1‘‘ पृष्ठ नं. 721

यक अर्ज गुफतम पेश तो दर गोश कुन करतार।
हक्का कबीर करीम तू बेएब परवरदगार।।
दूनियाँ मुकामे फानी तहकीक दिलदानी।
मम सर मुई अजराईल गिरफ्त दिल हेच न दानी।।
जन पिसर पदर बिरादराँ कस नेस्त दस्तं गीर।
आखिर बयफ्तम कस नदारद चूँ शब्द तकबीर।।
शबरोज गशतम दरहवा करदेम बदी ख्याल।
गाहे न नेकी कार करदम मम ई चिनी अहवाल।।
बदबख्त हम चु बखील गाफिल बेनजर बेबाक।
नानक बुगोयद जनु तुरा तेरे चाकरा पाखाक।।

सरलार्थ:-- हे (कुन करतार)करन कत्र्ता (गोश)निर्गुणी जिन्द संत (करीम)दयालु (हक्का कबीर)सतकबीर (तू)आप (बेएब परवदगार) निर्विकार परमात्मा है। (पेश तो दर)आप के समक्ष (यक)एक (अर्ज गुफ्तम)हृदय से विनती है कि (दिलदानी)हे महबुब(दूनियाँ मुकामे) यह संसार रूपी ठिकाना (फानी) नाशवान है। (तहकीक) यह पूरी तरह जान लिया है। (दानी)हे दाता(मम सर मुई) इस जीव के मरने पर (अजराईल) अजराईल नामक यम दूत (गीरफ्त दिल हेच न)बेरहमी से पकड़ कर ले जाता है (कस) कोई (दस्तं गीर) साथी (पिसर) जैसे बेटा (पदर) पिता (बिरादराँ) भाईचारा (नेस्तं) साथ नहीं देता। (आखिर) अन्त में (बयफ्तम) सभी उपाय और (तकबीर) फर्ज (कस) कोई क्रिया (नदारद चूँ शब्द)काम नहीं आता। (शबरोज) प्रतिदिन (गशतम) गश्त की तरह न रूकने (दर हवा) वाली चलती हुई वायु (बदी ख्याल)की तरह बुरे विचार (करदेम) करते रहते हैं। (नेकी कार)शुसुभ कर्म (करदम)करने का (मम ई)मुझे (चिनी) कोई (अहवाल) जरीया या साधन (गाहे न) नहीं मिला। (बदबख्त) ऐसे बुरे समय में कलियुग में (हम चु) हमारे जैसे (बखील) नादान (गाफिल) लापरवाह (बेनजर)सत मार्ग का ज्ञान न होने से अंधे (बेबाक)गुंगे थे।

नानक जी कहते हैं कि हे परमात्मा कबीर मैं (तेरे चाकरा) आपके सेवकों का भी सेवक अर्थात् आपके सेवकों के (पाखाक)चरणों की धूर हूँ, मैं नानक (बुगोयद) सच कह रहा हूँ अज्ञान साधना से भवसागर में डूबता हुआ (जन)बन्दा (तुरा)पार हो गया।

केवल हिन्दी अनुवाद:-- हे करन कत्र्ता निर्गुणी संत दयालु ‘‘सतकबीर‘‘ आप निर्विकार परमात्मा हैं। आप के समक्ष एक हृदय से विनती है कि हे महबुब यह संसार रूपी ठिकाना नाशवान है। यह पूरी तरह जान लिया है। हे दाता इस जीव के मरने पर अजराईल नामक यम दूत बेरहमी से पकड़ कर ले जाता है कोई साथी जैसे बेटा पिता भाईचारा साथ नहीं देता। अन्त में सभी उपाय और फर्ज कोई क्रिया काम नहीं आता। प्रतिदिन गश्त की तरह न रूकने वाली चलती हुई वायु की तरह बुरे विचार करते रहते हैं। शुभ कर्म करने का मुझे कोई जरीया या साधन नहीं मिला। ऐसे बुरे समय कलियुग में हमारे जैसे नादान लापरवाह, सत मार्ग का ज्ञान न होने से अंधे गुंगे थे। नानक आपके सेवकों के भी सेवक के चरणों की धूर डूबता हुआ बन्दा पार हो गया।

श्री नानक जी के पूर्व जन्म - सतयुग में राजा अम्बरीष, त्रोतायुग में राजा जनक हुए थे और फिर श्री नानक जी हुए।